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Friday, May 21, 2010

Wednesday, May 5, 2010

पैसे वाले..दिल्ली वाले..


अनुभव

हम शायद उस वक़्त उनका आशय समझ नहीं पाते जब हमारे बुज़ुर्ग बताते हैं कि ज़िन्दगी हमें हर मोड़ पर तथा कई तरह से बहुत कुछ सिखाती है। जैसे जैसे हमारा अनुभव बढ़ता जाता है, हम उन सारी बातों का अर्थ समझने लगते हैं जो हमारे लिए अर्थहीन थीं । हालाँकि इन सारी बातों को हम वक़्त रहते समझ लें तो हमारे लिए ही बेहतर है। यही गलती मुझसे पिछले कुछ दिनों में हुई, जिसका एहसास शायद मुझे जीवन भर रहेगा। दूसरी बड़ी गलती जिसका एहसास मुझे हमेशा रहेगा, वह एक बार फिर इंसान को पहचानने में हुई मेरी गलती है। इस बार मुझे अनुभव हुआ कि हर बार इंसान दरअसल वैसा होता नहीं है, जैसा दिखता या दिखने का नाटक करता है। कई बार खुद को बहुत भावुक या बहुत संवेदनशील दिखाने वाला इंसान अंदर से बहुत स्वार्थी और मतलब परस्त निकलता है। ऐसे इंसान मतलब निकल जाने पर अचानक अपने असली चोले मेंप्रकट हो जाता है। यह वो वक़्त होता है जब कई वज्रपात हम पर होते हैं। हम समझ नहीं पाते कि अपने विश्वास के टूटने का दुःख करें, इंसान को न पहचान पाने के अपने अनुभव की कमी को रोएं या उस इंसान की मलामत करें। दर असल कई बार गलती उस इंसान की भी नहीं होती जिससे आपको चोट पहुंची, क्यूंकि ऐसे लोगों के लिए हर इंसान टाइम पास या वक़्त पर इस्तेमाल कर फेंक देने की चीज़ होता है। या दूसरे शब्दों में एक सीढ़ी, जिस पर पैर रख कर आगे निकला जा सकता है। इन लोगों की नज़र में हर भावनात्मक रिश्ता एक इस्तेमाल करने की चीज़ है। ऐसे लोगों के लिए आपकी हमदर्दी, प्यार, सहयोग, स्नेह, सब एक स्वार्थ हैं। उल्टा ये लोग आपको ही गलत साबित करने की कोशिश भी करते हैं। क्यूंकि उनकी नज़र में उस निश्छल आचरण के पीछे भी कुछ न कुछ स्वार्थ होता है, जो आपने उनके साथ किया।
मेरे अनुभव से मैं यह समझ सका हूँ,की ऐसे लोगों की पहचान अक्सर धोखा खाने के बाद ही होती है। क्यूँकी यदि आपके मन में धोखा नहीं है तो आप पहचानने से पहले किसी को भी गलत नहीं मानते।
इंसान को पहचानने के मामले में यह मेरा दूसरा बुरा अनुभव था। जिसने मुझे सीख दी, की किसी को अपने अनुभव, स्नेह, हमदर्दी और सहयोग देने से पहले दस बार ज़रूर सोचा जाये।